ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट: पहाड़ों के भीतर बिछ रहा 213 KM का सुरंग नेटवर्क, 125 KM की रेल लाइन का 80% हिस्सा होगा अंडरग्राउंड; दिसंबर 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों तक रेल पहुंचाने का दशकों पुराना सपना अब तेजी से हकीकत में बदल रहा है। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक बन रही रेल परियोजना हिमालयी क्षेत्र में इंजीनियरिंग की एक बड़ी मिसाल बन रही है। करीब 125 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन का लगभग 104 किलोमीटर हिस्सा पहाड़ों के भीतर सुरंगों से होकर गुजरेगा। परियोजना में कुल 213.1 किलोमीटर से अधिक लंबाई का सुरंग नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को दिसंबर 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

यह परियोजना केवल उत्तराखंड के रेल नेटवर्क का विस्तार नहीं है, बल्कि गढ़वाल के पहाड़ी जिलों की कनेक्टिविटी, पर्यटन, धार्मिक यात्राओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने की क्षमता रखती है। परियोजना पूरी होने के बाद ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल के माध्यम से सफर करना संभव होगा। इससे सड़क मार्ग पर निर्भरता कम करने और पहाड़ी क्षेत्रों में आवागमन को अधिक सुविधाजनक बनाने में मदद मिलेगी।

125 किलोमीटर की रेल लाइन, 213 किलोमीटर का सुरंग नेटवर्क

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना की सबसे खास बात इसका विशाल सुरंग नेटवर्क है। सामान्य रेल परियोजनाओं में सुरंग और पुल निर्माण के कुछ हिस्से होते हैं, लेकिन इस परियोजना में पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सुरंगों का निर्माण सबसे बड़ा काम है।

करीब 125 किलोमीटर लंबी रेल लाइन ऋषिकेश के वीरभद्र स्टेशन से शुरू होकर चमोली जिले के कर्णप्रयाग स्थित सवाई गांव तक पहुंचेगी। इसमें लगभग 104 किलोमीटर मुख्य रेल सुरंगों के भीतर से गुजरेगी। परियोजना में कुल 16 मुख्य सुरंगें बनाई जा रही हैं। इनके अलावा आपातकालीन निकास सुरंगें, एडिट टनल, शाफ्ट और क्रॉस पैसेज भी विकसित किए जा रहे हैं।

रेल विकास निगम लिमिटेड के डीजीएम ओपी मालगुड़ी के अनुसार, परियोजना में कुल टनलिंग की लंबाई लगभग 213 किलोमीटर से अधिक है। इसमें मुख्य सुरंगों के साथ सुरक्षा और निर्माण कार्यों के लिए बनाई जा रही अन्य सुरंगें भी शामिल हैं।

यात्रियों की सुरक्षा के लिए अलग से एस्केप टनल

इतनी लंबी सुरंगों में रेल संचालन के दौरान यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्था की जा रही है। तीन किलोमीटर से अधिक लंबाई वाली सुरंगों में मुख्य सुरंग के साथ अलग आपातकालीन निकास सुरंग का प्रावधान रखा गया है।

मुख्य सुरंग और एस्केप टनल को प्रत्येक 375 मीटर की दूरी पर क्रॉस पैसेज के माध्यम से जोड़ा जा रहा है। किसी दुर्घटना, आग या अन्य आपात स्थिति में इन रास्तों का इस्तेमाल यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए किया जा सकेगा।

परियोजना की संरचना में 16 मुख्य सुरंगों, 12 एस्केप टनलों और 8 एडिट/शाफ्ट का प्रावधान बताया गया है। यह व्यवस्था हिमालय जैसे संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्र में सुरक्षित रेल संचालन के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

टनल खुदाई और लाइनिंग के आंकड़ों में समझें प्रोजेक्ट की प्रगति

इस परियोजना में निर्माण की गति के साथ तकनीकी गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। आरवीएनएल के अधिकारियों के अनुसार, लगभग 209 किलोमीटर टनलिंग का काम पूरा किया जा चुका है।

वहीं, सितंबर 2026 तक की आरवीएनएल प्रोग्रेस रिपोर्ट में 213.1 किलोमीटर के कुल टनलिंग लक्ष्य के मुकाबले 157.53 किलोमीटर टनल लाइनिंग पूरी होने का उल्लेख है।

यहां यह समझना जरूरी है कि सुरंग की खुदाई और उसकी लाइनिंग दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। खुदाई में पहाड़ के भीतर रास्ता बनाया जाता है, जबकि लाइनिंग में सुरंग की अंदरूनी संरचना को मजबूत और सुरक्षित बनाया जाता है। इसलिए दोनों के आंकड़ों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

कहीं ड्रिल-ब्लास्टिंग तो कहीं आधुनिक TBM तकनीक से हो रही खुदाई

हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सुरंगों का निर्माण करना आसान नहीं है। कहीं कठोर चट्टानें हैं तो कहीं पानी का रिसाव और कमजोर भूगर्भीय संरचनाएं निर्माण कार्य को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

इसी को देखते हुए परियोजना में अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिकांश स्थानों पर ड्रिल एंड ब्लास्ट और न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) तकनीक अपनाई गई है।

वहीं, देवप्रयाग से जनासू के बीच परियोजना की सबसे लंबी सुरंग में टनल बोरिंग मशीन (TBM) का इस्तेमाल किया गया है। यह सुरंग लगभग 14.58 किलोमीटर लंबी है और इसमें अप लाइन तथा डाउन लाइन के लिए दो समानांतर सुरंगें विकसित की जा रही हैं।

निर्माण के दौरान भूवैज्ञानिक विशेषज्ञ चट्टानों की स्थिति, उनकी मजबूती और पानी के रिसाव का लगातार अध्ययन करते हैं। जरूरत के अनुसार निर्माण की तकनीक और डिजाइन में बदलाव भी किए जाते हैं।

अलकनंदा और अन्य नदियों पर बन रहे बड़े रेल पुल

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में सुरंगों के अलावा नदियों और गहरी घाटियों के ऊपर रेल पुल बनाना भी बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है। गंगा, अलकनंदा और पहाड़ी नदियों के ऊपर कई महत्वपूर्ण पुल तैयार किए जा रहे हैं।

परियोजना की प्रोग्रेस रिपोर्ट के अनुसार, महत्वपूर्ण बड़े रेल पुलों में से आठ का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि 11 अन्य पुलों का काम जारी है।

श्रीनगर क्षेत्र में अलकनंदा नदी के ऊपर लगभग 489 मीटर लंबा रेल पुल बनाया जा रहा है। इसके अलावा देवप्रयाग क्षेत्र में बनने वाले पुल का सबसे लंबा स्पैन करीब 125 मीटर का है। गौचर क्षेत्र में भी अलकनंदा नदी के ऊपर रेल पुल का निर्माण किया जा रहा है।

इन पुलों के माध्यम से रेल लाइन को पहाड़ों, नदियों और गहरी घाटियों के बीच से सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है।

वीरभद्र से कर्णप्रयाग तक इन प्रमुख क्षेत्रों से गुजरेगी रेल लाइन

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का रूट कई महत्वपूर्ण धार्मिक, पर्यटन और पहाड़ी क्षेत्रों को जोड़ेगा।

वीरभद्र स्टेशन से आगे रेल लाइन ढालवाला और शिवपुरी क्षेत्र की ओर बढ़ेगी। इसके बाद गूलर, ब्यासी और कौड़ियाला होते हुए देवप्रयाग तक पहुंचेगी। देवप्रयाग से जनासू के बीच लंबी सुरंगों का निर्माण किया गया है।

इसके बाद रेल लाइन मलेथा और श्रीनगर क्षेत्र तक पहुंचेगी। श्रीनगर में अलकनंदा नदी के ऊपर बड़ा रेल पुल परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आगे धारी देवी क्षेत्र में दो प्रमुख रेल पुलों और सुरंगों का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।

इसके बाद रेल मार्ग तिलणी, घोलतीर और गौचर होते हुए चमोली जिले के कर्णप्रयाग स्थित सवाई गांव तक पहुंचेगा।

धारी देवी स्टेशन पर दिख रही आधुनिक इंजीनियरिंग की तस्वीर

परियोजना के निर्माण कार्यों में धारी देवी स्टेशन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां स्टेशन, रेलवे यार्ड, सुरंग और पुलों से जुड़े कई निर्माण कार्य किए जा रहे हैं।

परियोजना के पैकेज-6 के अंतर्गत श्रीनगर के जीएनटीआई ग्राउंड से डूंगरी पंत गांव तक लगभग 10 किलोमीटर के क्षेत्र में निर्माण कार्य चल रहा है।

ब्रिज इंजीनियर सहदेव आचार्य के अनुसार, इस पैकेज में दो महत्वपूर्ण रेल पुल और एक रोड ब्रिज शामिल हैं। रोड ब्रिज का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि रेल पुलों और स्टेशन से जुड़े अन्य निर्माण कार्य जारी हैं।

धारी देवी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए यहां पुलों और सुरंगों का निर्माण विशेष तकनीकी सावधानी के साथ किया जा रहा है।

दिसंबर 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य, उत्तराखंड को मिलेंगे कई फायदे

रेल विकास निगम लिमिटेड ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना को दिसंबर 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, पहाड़ी क्षेत्रों की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों और बड़े निर्माण कार्यों को देखते हुए परियोजना की समय-समय पर समीक्षा जरूरी होगी।

परियोजना पूरी होने के बाद चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी गढ़वाल सहित कई क्षेत्रों की रेल कनेक्टिविटी को लाभ मिलेगा। बदरीनाथ और केदारनाथ धाम की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को भी ऋषिकेश और कर्णप्रयाग के बीच बेहतर परिवहन विकल्प उपलब्ध हो सकेगा। इसके साथ ही स्थानीय लोगों, व्यापारियों और पर्यटकों के लिए आवागमन के नए रास्ते खुलेंगे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रेल परियोजना उत्तराखंड के उन पहाड़ी क्षेत्रों को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है, जहां अब तक सड़क मार्ग ही आवागमन का प्रमुख साधन रहा है।