जामिया मिलिया इस्लामिया में खत्म हुआ छात्र आंदोलन, दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव कराने पर बनी सहमति
देश की राजधानी स्थित प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI) में पिछले लगभग दो सप्ताह से चला आ रहा छात्रों का उग्र विरोध प्रदर्शन और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आखिरकार समाप्त हो गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन और आंदोलित छात्र प्रतिनिधियों के बीच देर रात तक चली लंबी और उच्चस्तरीय वार्ता के बाद एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। इसके तहत विश्वविद्यालय प्रशासन ने करीब 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कैंपस में छात्रसंघ चुनाव (Students’ Union Elections) कराने पर अपनी आधिकारिक सहमति दे दी है।
जामिया कैंपस में पिछले 14 दिनों से विभिन्न छात्र संगठनों के बैनर तले सैकड़ों छात्र विरोध प्रदर्शन पर बैठे थे। छात्रों की सबसे मुख्य और प्राथमिक मांग कैंपस में लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल करना तथा ठप पड़ी छात्र राजनीति को पुनर्जीवित करना था।
छात्रों का तर्क था कि दो दशकों से छात्रसंघ चुनाव न होने के कारण विद्यार्थियों की समस्याओं को उठाने और प्रशासन के समक्ष उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई आधिकारिक मंच उपलब्ध नहीं था।

प्रशासन और छात्रों के बीच समझौता
विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद सहमति का ड्राफ्ट तैयार किया गया। प्रशासन की ओर से लिखित आश्वासन और छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया शुरू करने के संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी किए जाने के बाद छात्रों ने अपनी भूख हड़ताल और धरना समाप्त करने की घोषणा की।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया कि आने वाले महीनों में चुनाव कराने की रूपरेखा तैयार करने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया जाएगा, जो चुनाव आचार संहिता और अन्य दिशानिर्देशों को अंतिम रूप देगी।
शिक्षा जगत में इस फैसले के क्या हैं मायने?
जामिया मिलिया इस्लामिया में दो दशक बाद छात्रसंघ चुनावों की बहाली को देश के शैक्षणिक संस्थानों में लोकतांत्रिक संवाद और छात्र राजनीति के पुनरुद्धार की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
- छात्रों की प्रतिक्रिया: समझौता होने के बाद कैंपस में जश्न का माहौल देखने को मिला। छात्र नेताओं ने इसे लोकतंत्र और छात्र एकता की बड़ी जीत करार दिया है।
- विशेषज्ञों की राय: शिक्षाविदों का मानना है कि इस निर्णय से विश्वविद्यालय परिसर में रचनात्मक संवाद बढ़ेगा और छात्रों को अपनी मांगें निष्पक्ष रूप से रखने का लोकतांत्रिक अधिकार वापस मिलेगा।
